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"काँच के शामियाने ' पर आर. एन. शर्मा जी के विचार


आर.एन.शर्मा जी एक बहुत ही सजग और गंभीर पाठक हैं . उन्हें पढने का बहुत शौक है . दुनिया के हर भाषा की  अधिकाँश विख्यात किताबें वे पढ़ चुके हैं और लगातार पढ़ते रहते हैं .
उनकी इस उपन्यास पर प्रतिक्रिया  खास मायने रखती है .
बहुत आभार आपका.
                                                                      


 काँच के शामियाने

'कांच के शामियाने'...उपन्यास पढ़ने के बाद अभी तक उसके कई चरित्र, जया-राजीव-संजीव-रूद्र आदि, दिमाग में घूम रहें हैं।

सोचता हूँ कोई इतना क्रूर और निर्दयी कैसे हो सकता है। न सिर्फ राजीव और उसके घरवाले [संजीव को छोड़] , बल्कि जया के इर्द गिर्द जो समाज है उसने भी जया की जिंदगी को नर्क बना दिया और कैसे जया भी इतना शारीरिक और मानसिक अत्याचार बर्दाश्त करती रही इतने लंबे समय तक महज़ इसलिए की उसके अपने घरवाले और आस पास के लोग क्या कहेंगे। पूरे उपन्यास में कम से कम 150 पृष्ठ तक यही कहानी है जो पाठक को अंदर तक न सिर्फ छू जाती है बल्कि हिला डालती है। कई घटनाएं आँखे नम कर जातीं है।सहानुभूति जैसा शब्द शायद छोटा है, लगता है की जया को खुद जाकर इस दलदल से निकाल लाएं। बाद की कहानी जया के साहस और उसके 3 समझदार बच्चों की कहानी है। दिन तो उसके पलटने ही थे पर बहुत समय लग गया। अंत में एक सुखद अहसास छोड़ गया...

बहुत समय पहले रश्मि जी की एक कहानी " छोटी भाभी" पढ़ी थी। पता नहीं क्यों " कांच के शामियाने" पढ़ते समय " छोटी भाभी" रह रह के याद आती रही। लगता नहीं की कोई कहानी पढ़ी जा रही है।यही रश्मि जी के लेखन का कमाल है।

रही बात भाषा की, हिंदी के साथ भोजपुरी का प्रयोग न सिर्फ अच्छा लगा बल्कि उसके होने से पटना, सीतामढ़ी और बिहार के दूर दराज़ इलाकों और वहां के रीत रिवाजों से पाठक अच्छी तरह वाकिफ हो सका। वहां की स्थानीय भाषा होने से वहां के सामजिक परिवेश की अच्छी झलक देखने को मिली। वैसे भी रश्मि जी के शब्दों और शैली का चयन बे मिसाल है।

इतने अच्छे उपन्यास के सृजन के लिए वे बधाई की पात्र हैं।


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