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विरोध का रिश्ता

तुम सोंचते हो                                                          
सुहाग के लिए होता है श्रृंगार
फिर क्यों मन मगन होता है किसी का
पनघट पर
गैलारे की प्यास बुझाकर
अपने हीं मन की उमंग, तरंग है ये
जो प्यार की छांव में सजता है
मदभरे नयनों से सराहा जाकर,
या उस उत्साह या उम्मीद में भी
सज रहा होता है श्रृंगार कहीं
सोचने पे लगेगा पाप है ये
तमाम औरतों की नजर में भी
पर मगन होती है औरतें
आह्लादित होता है मन उनका
पाप करके भी कभी
पाटना मुश्किल है
एक बहुत बड़ा अंतर
उसके अपने हीं दिल का
अंतर ब्याहता और जोगन का।
                                                - अपर्णा


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