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मुक्ता



जन्म से अभिशप्त हूँ मैं
जीवन से संतप्त हूँ मैं
समाज की हीं उपज हूँ
पर समाज से परित्यक्त हूँ मैं

मातृरूप का स्निग्ध स्नेह जब
संज्ञाशून्‍य नहीं कर पाया
भार्या रूप से पशुता को जब 
भोजन नहीं मिल पाया
किया मुझे निर्वासित जग से
पत्नीत्व से मातृत्व से
बना दिया वार-वनितायें
भागे कठोर कर्तव्य से

मुझे देख करुणा को भी
अब करुणा नहीं आती है
चीरहरण के चीत्कारों से
धरती फट भी नहीं पाती है
भुला हृदय के हुंकारों को
भूपालों के नगर सजाती हूँ
फूलों से चरणों से मैं
तन्मयता का लास दिखाती हूँ

पशुता को मदिरा मे डुबोकर
सारा विष पी जाती हूँ
पर जब जलकर विष में मैं
एकाकी हो जाती हूँ
मेरे अंत को कंधा देने तुम,
क्यों लौट नहीं पाते हो?
मैं हूँ बेटी या बहन तुम्हारी
क्यों सोच नहीं पाते हो? 
                                                     - अपर्णा



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