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किताबों की बेटी


     
ख़यालों की रोटी से किताबों की बेटी
पलकर बड़ी जब हुई हँसती-रोती,
न देखी थी दुनिया,न खेली थी गुड़िया,
न संगी और साथी थे गीता और मुनिया,
ख़यालों में उड़ना, उन्हीं में ठहरना,
बना ली थी उसने अजब सी अपनी दुनिया,

उसी में लहकती उसी में महकती
उसी में थी रोती, उसी में चहकती,
न जाना था उसने दुनिया की माया,
न समझा था उसने अपना पराया,

दुरागत, देसी, परदेसी,
सबसे अपनापन था उसका,
इंसानो के साथ जिये, 
एक हीं अरमान था दिल का,

सबसे मिलकर, सबमें मिलकर,
इंसानों में रमना चाहती थी,
अपनी पूँजी, अपनी दुनिया, 
अपने ख़याल बाँटना चाहती थी,

भूली थी वो दुनिया है अलग
तो नियम तरीके और चलन,
ये सब भी होंगे अलग-अलग.....

पागल सा था उसका वो मन
सपनों के महल बनाता था,
हक़ीकत की आँधी ऐसी,
हर बार महल ढह जाता था,

हर बार महल के बिखरने से
उसका अस्तित्व बिखरता था,
हर बार बिखर कर जुड़ने पर 
क्या उसमें कुछ निखरता था ?

हर बार महल बनकर टूटा
उसका अस्तित्व भी चूर हुआ,
किसके कंधे सिर रख रोए ?
हर कोई उससे दूर हुआ,

जो कहते थे की अपने हैं
उस सब ने उसको ठुकराया,
जिस-जिस से अपनापन चाहा 
कोई भी समझ नही पाया, 

कोई क्यों उसकी आवाज़ सुने,
क्यों कोई उससे प्यार करे ?
इस इंसानों की दुनिया में
कोई क्यों उसके साथ जिये ?

दुनिया का उसका रंग नहीं,
जीने का उसको ढंग नहीं,
किताबों की बेटी है वो,
मानवता की है उपज नही !

है कसूर यही उसका की वो 
इंसानों में है इंसान नही,
किताबों सी दुनिया चाहती है,
उसकी बुनियाद समाज नही,

हर जगह से टूटती हुई, 
जिंदगी ढूँढती हुई,
हर पल वो सोचा करती है......
ख्वाब भी चुभते हैं अब तो, 
और दुनिया भी दंश ही देती है......
                                                            - अपर्णा




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