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भूख

वह -
तुम्हारी भूख मिटाने का
एक साधन भर ही तो है.

भूख -
पेट की हो
या देह की,
भूख तो भूख है
जो स्वयं नहीं मिटती  -
मिटानी पड़ती है,
या फिर मारनी पड़ती है.

इसलिए,
जब पेट कुलबुलाता है तुम्हारा,
वह चल पड़ती है
रसोई की ओर ,
खाना परोसने.
सपने बुनती उँगलियाँ
वहीँ छोड़कर.

और जब पुकारती है
तुम्हारी देह,
परोस देती है स्वयं को,
बिना ये जताए
की उसकी भूख तो
कभी मिटी ही नहीं,
न पेट की, न देह की.....

                



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भूख

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