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हिन्दुस्तानी अदालत के ज़रिये उर्दू के ये शब्द हटा दिए गए

ज़बान और ज़िन्दगी के लिहाज़ से आसान वो है जो हमारे हाथ में है या हम जो कर सकते हैं और मुश्किल वो है जो हम नहीं कर सकते। कहने का मतलब ये है कि हमारे लिए आसान ज़बान वो है जो हम समझ पाते हैं और मुश्किल वो जो समझ नहीं पाते।

मिसाल के लिए किसी के लिए ‘बर्रे- सग़ीर’ आसान है, किसी के लिए ‘उपमहाद्वीप’ तो किसी के लिए ‘Subcontinent’ मुश्किल है। ज़बानों का मुश्किल और आसान होना उस सिलसिले का हिस्सा है जब हम ज़ोर-ज़बरदस्ती करते हुए या तो मख़्सूस ज़बान की लुग़त में बे-वज्ह के लफ़्ज़ शामिल करते हैं या हटाते हैं। और अचानक से किया गया ये बदलाव ख़तरनाक साबित होता है।

संस्कृत के लफ़्ज़ ‘यत्न’ से ‘यतन’ फिर ‘जतन’ का बनना और हिन्दी-उर्दू दोनों ज़बानों में राइज होना ज़बान के विकसित होने के सिलसिले का हिस्सा है लेकिन अचानक ही जतन को उर्दू की लुग़त से हटा देना उर्दू के साथ की जाने वाली ज़ियादती होगी।

‘बेहतरीन’ (Best) का मतलब कौन नहीं जानता होगा? मगर ‘बद-तरीन’ (Worst) का मतलब शाएद हर कोई नहीं जानता होगा। Best और Worst के साथ भी यही है कि Best लफ़्ज़ के मा’नी से वाक़िफ़ लोगों की ता’दाद Worst के मुक़ाबले में कहीं ज़ियादा होगी। लेकिन मेरा यक़ीन है कि आप में से जो भी इस ब्लॉग को पढ़ रहे होंगे वो बेहतरीन का मतलब भी जानते हैं, और बद-तरीन का भी, Best का भी और Worst का भी।

सोच कर देखिए इस क़दर आम और आसान लफ़्ज़ भी किसी किसी के लिए मुश्किल बल्कि मुश्किल-तरीन हैं। फिर ज़बान मुश्किल हुई या इल्म कमज़ोर? देखा जाए तो हिन्दुस्तान में ज़बान फ़क़त जज़्बात के इज़्हार का ज़रीआ बन कर रह गई है।

ये सब इसी सिलसिले का हिस्सा है कि एक वक़्त में जिस ख़ुदा-ए-सुख़न मीर की उर्दू आसान मानी जाती थी आज वही उर्दू हम लोगों के लिए मुश्किल हो चुकी है। क्या ऐसे में ये मुमकिन नहीं है कि आज की आम- फ़ह’म हिन्दी या उर्दू आने वाली नस्लों के लिए मुश्किल साबित होगी?

अगस्त 2019 को दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त से सवाल किया था कि FIR लिखने में अब तक उर्दू-अरबी-फ़ारसी के अल्फ़ाज़ का इस्ते’माल क्यों होता है, जब कि शिकायतकर्ता इस भाषा को न जानते हैं, न समझने हैं और न ही इसका इस्ते’माल शिकायत दर्ज कराने के वक़्त करते हैं। कोर्ट का मानना था कि ऐसे अल्फ़ाज़ सिर्फ़ वो लोग ही समझ सकते हैं जिन्हें उर्दू-अरबी-फ़ारसी में डॉक्टरेट का दर्जा हासिल हो। और इस फ़ेहरिस्त में तक़रीबन 340 अल्फ़ाज़ शामिल किए गए। जिनमें से एक तो ‘फ़ेहरिस्त’ ही है। ज़ाहिर है ज़रा-सा भी पढ़ा लिखा आदमी फ़ेहरिस्त लफ़्ज़ का मतलब जानता है।

इस का मतलब ये हुआ कि हमने ता’लीम को बढ़ावा देने की बजाए ज़बान में काट- छाँट करना मज़ीद मुनासिब समझा। नतीजतन हम अपनी ज़बानों से अनजान होते चले गए और आम ज़बान हमारे लिए मुश्किल होती चली गई। होती चली जा रही है। शाएद होती भी जाएगी।

ग़ौर करने की बात है कि कितने लोग जानते होंगे कि पुलिस को हिन्दी में क्या कहते होंगे? पुलिस तो वो लफ़्ज़ है, जो पन्द्रहवीं सदी की शुरुआत में अंग्रेज़ी में देखा गया, जिसकी अस्ल ग्रीक ज़बान है। ग्रीक में इसे Pólis बोला जाता था। ग्रीक से लातीनी में जा कर ये Politia हुआ उसके बा’द middle French में शामिल हो कर Police होता हुआ अंग्रेज़ी का Police हो गया। जिस कचहरी में शिकायतकर्ता बोला जाता है (जहाँ शिकायत अरबी के शिकाया से फ़ारसी का शिकायत बना और कर्ता जिसकी अस्ल संस्कृत है) उस कचहरी को उर्दू-अरबी-फ़ारसी के दीगर अल्फ़ाज़ से गुरेज़ किस लिए? कितने ही लोग जानते होंगे कि शिकायत को हिन्दी में क्या कहते हैं। कचहरी में तो याचिका भी ‘’दाएर’’ होती है। दाएर को हिन्दी में क्या कहते हैं? दाएर अरबी का लफ़्ज़ है और दाएर के हवाले से Oxford Dictionary में भी (दायर dāyr [A. dāʾir], adj. going round: in process; instituted (proceedings, suit); filed (complaint). — ~ करना, to institute, &c. दायर-ओ-सायर [A. sāʾir], m. Pl. U. circuit (of judges, &c.) लिखा हुआ है।

आइए देखते हैं अदालत द्वारा हटाए गए 340 अल्फ़ाज़ में से कुछ अल्फ़ाज़:

1- मुजरिम (अपराधी)

2- ओहदा (पद)

3- अस्लीयत (मौलिकता)

4- इक़रार (स्वीकृति, दोष-स्वीकृति)

5- इत्तिलाअ (अधिसूचना)

6- इन्तक़ाम (प्रतिशोध)

7- इल्ज़ाम (आरोप)

8- इन्तज़ाम (प्रबन्ध, व्यवस्था)

9- ख़िदमत (सेवा)

10- ख़ाना- तलाशी (घर की छान- बीन)

11- गुज़ारिश (निवेदन, प्रार्थना)

12- गुफ़्तुगू (वार्तालाप)

13- गिरोह (समूह)

14- चश्मदीद (आँखों देखा)

15- सज़ा- याफ़्ता (सिद्ध अपराधी)

16- ज़ाहिर (स्पष्ट)

(भला ‘’ज़ाहिर है’’ या ‘’ज़ाहिर सी बात है’’ जुमले कब हम हिन्दुस्तानियों के लिए नए या मुश्किल हो गए।)

17- तहरीर (अभिलेख)

18- तलब (अभियाचना, चाह, बुलावा)

19- तेज़धार हथियार (Sharp weapon) तेज़धार हथियार भी? (क्या ये भी आम आदमी को समझ में न आने वाला लफ़्ज़ है?)

20- तअल्लुक़ (सम्बन्ध)

21- ता’मील (अनुपालन)

22- तफ़्तीश (जाँच पड़ताल)

23- दस्तावेज़ (लेख पत्र)

24- दस्तख़त (हस्ताक्षर) (मेरा मानना है कि अगर दस्तख़त मुश्किल लफ़्ज़ है, तो हस्ताक्षर भी है।)

25- दुरुस्त (ठीक, उचित)

26- हालत (स्थिति)

27- फ़ुज़ूल (व्यर्थ)

28- फाँद कर

29- बा- क़ाएदा (नियमानुसार)

30- मौक़ा (अवसर, स्थान)

31- मुद्दई (शिकायतकर्ता?)

32- मुनासिब (उचित)

33- मौजूदगी (उपस्थिति)

34- मुलाहिज़ा (देखना)

35- मुख़बिर (भेदिया, सूचनादाता)

36- मसरूफ़ (व्यस्त)

37- नतीजा (परिणाम)

38- रंजिश (शत्रुता)

39- वारदात (घटना)

40- संगीन जुर्म (गम्भीर अपराध)

41- शख़्स (व्यक्ति)

42- शिनाख़्त (पहचान)

43- हिदायत (शिक्षा, सीख)

44- सह (साथी)

(सह को क्यों हटाया गया? सहपाठी तो हर बच्चा हिन्दी की पहली जमाअत में सीख जाता है।)

आप अदालत की जानिब से की गई इस कारवाई पर नहीं बल्कि ये सवाल अपने आप से कीजिएगा कि अदालत को ये क़दम क्यों उठाना पड़ा।



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