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अमीर मीनाई: जिनका कलाम उन के नाम से ज़ियादा मशहूर हुआ

“सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब, आहिस्ता आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता आहिस्ता”

जगजीत सिंह जब ये ग़ज़ल गाते हैं तो सुनने वाले भी आहिस्ता आहिस्ता एक अलग दुनिया में पहुँच जाते हैं, एक अजब सा नशा, एक अलग सा ख़ुमार छा जाता है, जिससे बाहर आने का दिल नहीं होता! क्या ये सिर्फ़ जगजीत की आवाज़ का जादू है या ये लफ़्ज़ भी करामाती हैं? ये जानने का बस एक तरीक़ा है, ये शेर पढ़िए,

ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम ‘अमीर’
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है

क्या आप अब भी वही ख़ुमार महसूस कर पा रहे हैं? अगर आपका मिज़ाज ज़रा भी शायराना है तो ज़रूर कर रहे होंगे। ये शायरी का असर है और ये शायरी है उस्ताद शायर अमीर मीनाई की!

अमीर मीनाई एक ऐसे अहम शायर हैं जिन पर बहुत कम बात होती है, चूँकि वो हमारी शेरी रवायत के बड़े शायर हैं और मुआमिला ये है कि उनका कलाम उनसे ज़ियादा मशहूर है। अमीर मीनाई का नाम बहुत लोग नहीं जानते लेकिन उनके अशआर फिर भी लोगों की ज़बाँ पर रहते हैं, मिसाल के तौर पर “ज़मीं खा गयी आसमां कैसे कैसे”, ये मिसरा हमारे यहाँ एक कहावत की सी सूरत इख़्तियार कर चुका है, ये अमीर मीनाई के शेर का ही मिसरा है,

हुए नामवर बे-निशाँ कैसे कैसे
ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे

महबूब की सादगी की वो इंतिहा जिसे बेरहमी भी कहा जा सकता है उसके लिए ये मिसाल भी बहुत मशहूर है कि वो क़ब्र पर आ कर हाल पूछता है,

अल्लाह-रे सादगी नहीं इतनी उन्हें ख़बर
मय्यत पे आ के पूछते हैं इन को क्या हुआ

अमीर मीनाई, दाग़ देहलवी के समकालीन शायर थे, इनसे बिल्कुल पहले का दौर ग़ालिब का अहद था, हालाँकि ग़ालिब इन दोनों शायरों की वफ़ात से चालीस पैंतालीस साल पहले वफ़ात पा चुके थे लेकिन ग़ालिब ने उस दौर के सब शायरों को मुतास्सिर किया, लेकिन ये बात दिलचस्प है कि दाग़ और अमीर मीनाई दोनों ने ग़ालिब की इस ग़ज़ल “ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता” की ज़मीन में ग़ज़लें कही हैं, अमीर मीनाई ने ये ग़ज़ल 1860 में, नवाब यूसुफ़ अली ख़ान “नाज़िम” जो कि रामपुर के नवाब थे, की फ़रमाइश पर कही थी और दाग़ देहलवी ने भी नवाब की फ़रमाइश पर इसी ज़मीन में ग़ज़ल कही, दाग़ की ग़ज़ल का मतला है,

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता

अमीर मीनाई की ग़ज़ल के चंद अशआर हैं,

मिरे बस में या तो या-रब वो सितम-शिआर होता
ये न था तो काश दिल पर मुझे इख़्तियार होता

मैं ज़बाँ से तुम को सच्चा कहो लाख बार कह दूँ
इसे क्या करूँ कि दिल को नहीं ए’तिबार होता

मिरी ख़ाक भी लहद में न रही ‘अमीर’ बाक़ी
उन्हें मरने ही का अब तक नहीं एतिबार होता

अमीर मीनाई की ग़ज़लें तो क्लासिकी शायरी की उम्दा मिसाल हैं ही, मगर एक बात जो कम लोग जानते हैं वो ये कि अमीर मीनाई सूफ़ी शायर थे जिन्हें हम्द और नात कहने में महारत हासिल थी।

हम्द और नात दो सिन्फ़ हैं जिनमें हम्द ख़ुदा की शान में लिखी जाती है और नात हुज़ूर यानी पैग़म्बर मोहम्मद की तारीफ़ में। सूफ़ी शायर ख़ुदा में बेइंतिहा यक़ीन रखने वाले और ख़ुदा से मोहब्बत करने वाले थे, जो सूफ़ी संत थे उनमें से भी कई सूफ़ी शायर थे। पंजाबी में तो तक़रीबन हर पुराना शायर, सूफ़ी संत रहा है या हर सूफ़ी संत, शायर रहा है चाहे वो बाबा फ़रीद हों या बुल्ले शाह!

सूफ़ी पंथ की एक ख़ास बात ये भी है कि चाहे वो ख़ुदा की बात करें, चाहे पैग़म्बर की, चाहे अपने आशिक़ की, चाहे अपने आप की, वो बात हर किसी पर लागू होती है, बड़े यूनिवर्सल लहजे में ऐसी शायरी की जाती है।

नात और हम्द आज के ज़माने में कम कही जा रही हैं, या कही भी जाती हैं वो मशहूर नहीं होती या उस मेयार की नहीं होतीं, अक्सर नात जो गायी जातीं हैं, वो काफ़ी पुरानी हैं, इस लिहाज़ से भी अमीर मीनाई की शायरी ज़रूरी हो जाती है, उनकी लिखी ये जो हम्द है, देखिए,

दूसरा कौन है, जहाँ तू है,
कौन जाने तुझे, कहाँ तू है

लाख परदों में तू है बेपरदा
सौ निशानों में, बे-निशां तू है

तू है ख़ल्वत में, तू है जल्वत में
कहीं पिनहाँ कहीं अयाँ तू है

नहीं तेरे सिवा यहाँ कोई
मेज़बां तू है मेहमाँ तू है

ये वहदत उल वुजूद है जिसका मतलब है ख़ुदा और कायनात का एक होना, हर तख़लीक़ के अंदर ख़ालिक़ भी मौजूद होता है, ज़र्रे ज़र्रे में ख़ालिक़ का होना, ऐसी बात जो इंसान की समझ से परे है, बुल्ले शाह जब कहते हैं,

“बुल्ला की जाणा मैं कौन”

तो वो भी उसी वुजूद की तरफ़ इशारा है जो हम सब हैं मगर जो हमसे भी बहुत ज़ियादा है। अमीर मीनाई ने बहुत सी नात भी लिखी हैं जो बहुत मशहूर हैं, उनमें से एक नात है, “क़ाबू में नहीं है, दिल-ए-शैदा-ए-मदीना”

क़ाबू में नहीं है, दिल-ए-शैदा-ए-मदीना
कब देखिए बर आए तमन्ना-ए-मदीना

आती है जो हर शय से यहाँ उन्स की ख़ुशबू
दुनिया-ए-मुहब्बत है कि दुनिया-ए-मदीना

इसके अलावा उनकी यह नात भी बहुत मशहूर है जो ऐसे शुरू होती है,

ख़ल्क़ के सरवर, शाफ़े ए महशर सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम
मुर्सले दावर ख़ास पयम्बर सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम

या फिर ये नात जो ज़माने भर में मशहूर है,

तुम पर मैं लाख जान से क़ुरबान या रसूल
बर आएं मेरे दिल के भी अरमान या रसूल

दुनिया से और कुछ नहीं मतलूब है मुझे
ले जाऊँ अपने साथ मैं ईमान या रसूल

इस शौक़ में कि आपके दामन से जा मिले
मैं चाक कर रहा हूँ गरेबान या रसूल

बहुत पुराने वक़्त से हर तरह की कला सूफ़ियों की ख़ानक़ाहों में पली-बढ़ी है चाहे वो शायरी हो, मौसिक़ी हो या दूसरे अस्नाफ़, दर-अस्ल बात ख़ुदा की नहीं बल्कि उन अहसासात की है जो हमें हमारे वुजूद से कुछ ज़ियादा बनाते हैं और ऐसे में ख़ुदा और मुहब्बत, दो ही शय हमें नज़र आती हैं, सूफ़ियों ने उन दोनों को एक कर के हम से मिलाया है।

यही वज्ह है कि आज भी ये शायरी ख़ुदा के मानने वालों और ख़ुदा के मुंकिरों पर एक सा असर रखती है,

रंग तेरा चमन में बू तेरी
ख़ूब देखा तो बाग़बां तू है

न मकाँ में न ला मकाँ में कुछ
जलवा फ़रमा यहाँ वहाँ तू है



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