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वक़्त ने करना है तय सबका सफ़र

उम्र तारी है दरो दीवार पर.
खाँसता रहता है बिस्तर रात भर.

 

जो मिला, मिल तो गया, बस खा लिया,
अब नहीं होती है हमसे न-नुकर. 

 

सुन चहल-कदमी गुज़रती उम्र की,
वक़्त की कुछ मान कर अब तो सुधर. 

 

रात के लम्हे गुज़रते ही नहीं,
दिन गुज़र जाता है खुद से बात कर.

 

सोचता कोई तो होगा, है वहम,
कौन करता है किसी की अब फिकर.

 

था खरीदा, बिक गया तो बिक गया,
क्यों इसे कहने लगे सब अपना घर.

 

मौत की चिंता जो कर लोगे तो क्या,
वक़्त ने करना है तय सबका सफ़र.




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