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ज़िन्दगी भी रेत सी फिसल गई ...

पीठ तेरी नज्र से जो जल गई.
ज़िन्दगी तब से ही हमको छल गई.

 

रौशनी आई सुबह ने कह दिया,
कुफ्र की जो रात थी वो ढल गई.

 

मुस्कुराए हम भी वो भी हंस दिए,
मोम की दीवार थी पिघल गई.

 

रात भर कश्ती संभाले थी लहर,
दिन में अपना रास्ता बदल गई.

 

इस तरफ कूआं तो खाई उस तरफ,
बच के किस्मत बीच से निकल गई.

 

जब तलक ये दाड़ अक्ल का उगा,
ज़िन्दगी भी रेत सी फिसल गई.



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