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हैंग-ओवर उम्मीद का ...


एहसास ... जी हाँ ... क्यों करें किसी दूसरे के एहसास की बातें, जब खुद का होना भी बे-मानी हो कभी कभी ... अकसर ज़िन्दगी गुज़र जाती है खुद को च्यूंटी काटते ... जिन्दा हूँ, तो जिन्दा होने एहसास क्यों नहीं होता  ... 

उँगलियों में चुभे कांटे
इसलिए भी गढ़े रहने देता हूँ 
की हो सके एहसास खुद के होने का

हालाँकि करता हूँ रफू ... जिस्म पे लगे घाव
फिर भी दिन है की रोज टपक जाता है ज़िन्दगी से 

उम्मीद घोल के पीता हूँ हर शाम    
कि बेहतर है सपने टूटने से
उम्मीद के हैंग-ओवर में रहना

सिवाए इसके की खुदा याद आता है
वजह तो कुछ भी नहीं तुम्हें प्रेम करने की 

और वजह जंगली गुलाब के खिलने की ...?
ये कहानी फिर कभी ...

#जंगली_गुलाब



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