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देश प्रेम देश भक्ति और देश

विश्वविद्यालय
देश के कहाँ होते हैं
विश्व के होते हैं
सिखाये हुऐ के
हिसाब से होते हैं
देशप्रेम छोड़िये
बड़े प्रेम विश्वप्रेम
पर चल रहे होते हैं
पर कन्फ्यूजन
भी होते हैं और
अपनी जगह पर होते है चाँसलर वाईस चाँसलर प्रोफेसर देश के ही
बराबर के ही होते हैं
कभी लगता है
देश से भी शायद
कुछ और बड़े होते हैं
छात्र छात्राएं
अभिभावक
दलों के हिसाब से
अलग अलग होते हैं
नारे लगते समय
नहीं दिखते हैं
जरूरत भी
नहीं होती है
और वैसे भी
पता कहाँ किसी
को होते हैं
कोई नहीं पूछता है
हिसाब किताब
किताबों कापियों
की दुकानों का
स्कूल कालेज और
पढ़ाई सब अलग
अलग विषय होते हैं
हिन्दू मुसलमान
शहर गाँव
इलाका विशेष
ठाकुर बनिया
बामन कुत्ता बिल्ली
के काम्बिनेशन
अलग अलग होते हैं
 कहाँ किस का
प्रयोग करना है
वही लोग जानते हैं
जिनके हिसाब किताब
के बही खाते
एक जैसे ही
और कुछ अलग होते हैं
प्रयोग जातियों पर
जितने विश्वविद्यालयों
में होते हैं और कहीं भी
नहीं नहीं दिखते हैं
ना ही कहीं होते हैं
 कुत्ता फालतू मे
गाली खाता है
हमेशा ही लेकिन वो
सही में कुछ इस
तरीके के ही
गली के कुत्ते होते हैं
नारे उगते हैं पता नहीं
कहाँ किस खेत में
बस दिखते हैं
उगते हुऐ देश द्रोही
के नाम पर सारों में
से कुछ छोड़ कर
सारे के सारे
अन्दर हो रहे होते हैं
जय हो देश की
देश प्रेमियों की
उनके पैजामों के
अन्दर की हवा में
उनके उगाये मटर
हरे हरे हो रहे होते हैं
देश का खून पीने
के लिये लगाये गये
नलों से टपकने वाले
खून के चर्चे कहीं भी
नहीं हो रहे होते हैं
 पाले हुऐ सरकार के
सरकारी लोगों के
काम देख कर भी
अनदेखे हो रहे होते हैं
जो नियम से करते है
नियम को देखसुन कर
नियम के हिसाब से
ऐसे सारे के सारे
देशद्रोही देश के
कोने कोने मे
रो रहे होते हैं
माफ करियेगा ’उलूक’
जानता है तेरे शहर में
तेरे मोहल्ले में तेरे घर में
इस तरह के जलवे
हो भी और नहीं भी
हो रहे होते हैं
लिखने दे बबाल ना कर
मत बता मुझे मेरे हाल
मुझे पता है तेरे जैसे
ना हो सकते हैं ना होंगे
ना हो रहे होते हैं ।

चित्र साभार: www.gograph.com


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