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Rape Statistics & Misuse of Social Media in India

सोशल मीडिया विशेषतः फ़ेसबुक व ट्विटर पर आजकल सोशल नेटवर्किंग साइट्स से पीएचडी में भी गोल्ड मेडलिस्ट हुए तथाकथित बुद्धिजीवियों ने अजीबोगरीब दुर्गंध युक्त रायता फैला रखा हैं। मेरा होम पेज पिछले हफ़्ते-पंद्रह दिनों से जम्मू कश्मीर की कठुआ घटना के जस्टिस फ़ॉर आशिफ़ा के पोस्टरों-निर्मम तस्वीरों से, 2012 के निर्भया कांड के बाद एक बार फिर भरा पड़ा हैं। लाइक, कमेंट और शेयर के सहारे तथ्यों पर बातें करना छोड़ सब इसे राजनीतिक, जातिगत व धार्मिक चोले में रंगने पर लगे हुए हैं।

विडंबना देखिए, इतनी जागरूकता व जनक्रंति के वावजूद नित्यप्रतिदिन अखबारों के पन्ने पर बलात्कार व छेड़खानी की खबरों की बाढ़ के पानी में तनिक भी कमी देखने को नहीं मिल रही।

विवाद व मतभेदों से बचने के लिए मैं सर्वप्रथम अपना स्टैण्ड साफ कर देना चाहता हूँ कि मेरे अनुसार बलात्कार एक पाशविक कृत्य हैं, जिसे सभ्य समाज किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं कर सकता। बालात्कार पीड़िता को शीघ्रातिशीघ्र न्याय और बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा देना न्यायपालिका का प्रमुख कर्तव्य व नैतिक जिम्मेदारी हैं। एक जिम्मेदार जागरूक नागरिक के रूप में, मुझे अपने देश की न्यायिक व लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास व आस्था हैं।

लेकिन जनाब, आप कर क्या रहे हैं? अपने तार्किकता को राजनीतिक-धार्मिक एजेंडों के हवाले कर कुछ भी शेयर और पोस्ट कर वास्तविक समस्या का पोस्टमार्टम करने पर तुले हैं। आज आपको बलात्कारियों में भी धार्मिक और राजनीतिक रंग देख रहे हैं। मुझे तो उन तथाकथित बेरोजगारी से जूझ रही बॉलीवुडिया गैंग पर शर्म सी आ रही हैं, जो आज फिर शर्मिंदगी का कार्ड बोर्ड लेकर मानवीय मूल्यों व संवेदनाओं पर गिद्ध की तरह टूट पड़ी हैं। जिन्हें आज इंडिया और भारत में हिंदुस्तान दिखाई दे रहा हैं। इन “डिजाइनर कैम्पेनरो” ने मंदिरों से लेकर हिन्दू देवी-देवताओं पर खूब छीटा-कसी की और उनका अपमान किया। देश के अंदर कहीं कुछ हो जाती हैं, तो प्रधानमंत्री मोदी को दोषी ठहराने की इन्होंने विचित्र परंपरा का शुभारंभ किया हैं।

हे मानसिक विछिप्त गैंग, आप मुझे बताओ कि”बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, जिससे हरियाणा जैसे कई राज्यों के लिगांनुपात में सकारात्मक सुधार देखा गया है, जैसी योजनाओं का बालात्कार से क्या तार्किक संबंध हो सकता हैं? क्या बीजेपी या NDA सरकार के मेनिफेस्टो या नीतियों में बलात्कारियों के प्रोत्साहन का कहीं जिक्र हैं। बलत्कार के लिए पद्मश्री, पदमभूषण या भारत रत्न मिलने लगा हो तो बताएं? जनकल्याणकारी योजनाओं को लेकर आपके इस द्रोही रवैया से, मुझे आपपर शर्म आती हैं।

यदि Ministry of Home Affairs द्वारा जारी Crimes in India 2016 में प्रकाशित आकड़ो पर बातें किया जाय, तो वर्ष 2016 में महिलाओं के खिलाफ 3, 38, 954 अपराध दर्ज किए गए, जिनमें 11.5% आंकड़े बलात्कार के थे। यह संख्या 38, 947 थीं, जिसके संख्या बढ़ाने में शीर्ष योगदान मध्य प्रदेश (4,882), उत्तर प्रदेश (4,817) एवं महाराष्ट्र (4, 189) ने किया। वहीं दूसरी ओर Protection of Children from Sexual Offences Act 2012 के अंतर्गत 36,022 मामले दर्ज किये गए। हम इस तथाकथित तथ्य को आज भी अस्वीकार नहीं कर सकते कि बलात्कार के अनेकानेक मामले आज भी न्यायपालिका के पन्नों पर दर्ज नहीं होते।

देश में हुए बलात्कार की 38, 947 पाश्विक घटनाओं से 39, 068 पीड़िताओं को असंख्य शारिरिक, मानसिक व सामाजिक दर्द से गुजरना पड़ा होगा, जिनमें 2171 महिलाओं के साथ 2167 दर्ज मामलों में गैंग रेप का वर्णन मिलता हैं। साथ ही साथ 5729 दर्ज अपराधों के अनुसार 5732 महिलाओं के संग बलात्कार का प्रयास हुआ। बलत्कार पीड़िता के उम्र संबंधित तालिका निम्न हैं…

हे हमारे सो कॉल्ड बुद्धिजीवी वर्ग… देख रहे हैं न उपरोक्त संख्याओं को। 6 वर्ष से कम उम्र की 520 बच्चियों, जो सिर्फ मांस की एक लुथड़ी भर थीं, उनके साथ दरिंदों ने बलात्कार की घटनाएं की। वही अपने जीवन के 60 से अधिक वसंत देख चुकी 57 महिलाएं दरिंदों के हवस का शिकार हुई। ओवरऑल 18 वर्ष से कम उम्र की नाबालिग लड़कियों से हुए बलत्कार के कुल आंकड़े 16863 थे। वहीं 18 वर्ष से 30 वर्ष तक की आयुवर्ग की 16462 युवतियों को दरिंदगी की पाशविक पीड़ा से गुजरना पड़ा, जो पीड़िताओं के अन्य विभिन्न आयुवर्गों के तुलना में सर्वाधिक था।

अब निम्नांकित सारणी पर गौर कीजिए…

हैल्लो जनाब….ई जो बलात्कार को अंजाम देने वाले बलात्कारी हैं न…आपके अपने ही घर, परिवार, समाज, कार्यस्थल पर मुखोटे में छुपकर प्लानिंग कर रहे हैं। इनमें से कई, आपके समक्ष महिलाओं के रहनुमा होने का नाटक बखूबी निभाते हुए कैंडल मार्च के अगुवा बनते हैं, पुरस्कार वापसी का ढोंग रचते हैं और मानवाधिकारों का रंडी रोना रोते हुए पीठ पीछे सहकर्मी को माल, पटाखों की उपमा से समानित कर उनके उभारों से बने क्लीवेज का वर्णन करते हुए महिमामंडन करते हैं। अब देखिए कैसे तस्वीरे साफ हो रही हैं, सिर्फ 5.4% (2088)अपराधों में ही पीड़िता, बलात्कारियों से पूर्व अपरिचित थीं। बाकी 36, 859 अपराधों में अपराधी अपने पारिवारिक सदस्य, संगी सम्बन्धी रिश्तेदार, पड़ोसी, ऑफिस में बॉस व सहकर्मी, पूर्व पति से लेकर लीव इन पार्टनर और शादी का झांसा देकर यौन शोषण सम्मिलित थे। मुझे सर्वाधिक हृदयविदारक पीड़ा, उन 630 मामलों को लेकर हुई हैं, जिसमें आरोप पीड़िता के दादाजी, पिता, भाई जैसे रिश्तों पर लगा। मार्च 2017 से फरवरी 2018 तक के आंकड़ों पर गौर करें, तो सिर्फ झारखंड में बलात्कार की कुल 1317 घटनाएं सामने आयी हैं। अब आप ही बताओ, कि इन बलात्कार के पाशविक अपराधों के लिए मोदी जी व उनकी नीतियों को किस आधार पर जिम्मेदार ठहराया जा सकता हैं..?

महिलाओं के प्रति आज के 21वी शताब्दी के द्वितीय दशक में ताबड़तोड़ हो बलात्कार के खबरों से इंडिया का भारत पर विश्वास बड़ी तीव्रता से घटा हैं। आज के इस वैश्वीकरण के दौर में बलात्कार जैसा वैश्विक अपराध जिस तरह अपने पैर पसार, इससे मेरे मन में एक सवाल उठा क्या सच में भारत बलात्कारियों का अड्डा बन चुका हैं ?

जी बिल्कुल नहीं, विकसित देशों के आंकड़े और अधिक पीड़ा दायीं हैं। भारत में प्रत्येक घंटे औसतन 5 और प्रतिदिन 107 रेप की घटनाएं सामने आती हैं, वहीं इंग्लैंड व वेल्स जैसे अल्प आबादी वाले देश में 11 रेप की घटनाएं प्रत्येक घंटे दर्ज कराई गई। जबकि अमेरिका जैसे सो कॉल्ड भौकाल टाइप देश में प्रत्येक 98 सेकंड में बलात्कार की एक घटना सामने आ रही हैं। शुक्रिया अदा कीजिए कि आप भारत में हैं, विदेशों में तो पुरूष भी यौनाचार के अपराधों से असुरक्षित हैं।
कल ही हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अध्यक्षता में, कैबिनेट की बैठक में आपराधिक कानून संशोधन अध्यादेश 2018 को मंजूरी देकर राष्ट्रपति को अग्रेषित किया गया। जिसे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी के द्वारा मंजूरी देने के बाद देश भर में लागू हो गया। इस अध्यादेश के अनुसार सोलह वर्ष से कम आयु की बालिकाओं के साथ दुष्कर्म के मामले में पूर्व निर्धारित न्यूनतम सजा को 10 वर्ष से बढ़ाकर बीस वर्ष कर दिया गया है, जिसे आजीवन कारावास में भी बढ़ाया जा सकता है। वहीं 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से दुष्कर्म करने की स्थिति में मौत की सजा दी जाएगीअब दुष्कर्म के सभी मामलों की जांच और सुनवाई दो महीने के भीतर ही पूरी करनी होगी

देश में उमड़े नकारात्मक शक्तियों के खिलाफ लड़ाई में क्या इस प्रकार के कानूनों से अपराध में कमी आएगी ? ऐसे प्रश्नों का जवाब तो भविष्य को देना है! फिलहाल डेटा चोरी के आरोपों से जूझ रही फ़ेसबुक यदि शीघ्रातिशीघ्र इस गंदगी का निपटान नहीं करती हैं तो निश्चित ही दूरगामी परिणाम के रूप में अपनी उपयोगिता व लोकप्रियता के ह्रास के संग सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता हैं।

असुरों से सुरक्षित रहें, घर-बाहर बहुत हैवी रिस्क हैं।

जय हो..!

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©पवन Belala Says 2018

References:

  1. Crimes in India 2016 Published by Ministry of Home Affairs, Government of India
  2. https://www.rainn.org/statistics
  3. https://www.prabhatkhabar.com/news/crime/rape-punishment-ordinance-modi-government/1147528.html


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