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मैं फिर भी तुमको चाहूँगा… -3

कोटि-कोटि धन्यवाद मेरे प्यारे-न्यारे-राजदुलारे सुधी पाठकों.. मैं फिर भी तुमको चाहूँगा कहानी श्रृंखला की पहली दो कड़ियों को आपने जो प्यार किया हैं, इससे अविभूत होकर कहानी की अगली कड़ी आपसबों संग साझा कर रहा हूँ। माना कि तनिक ज्यादा ही विलंभ हुई, परंतु इश्क़ और प्यार का असली मज़ा प्रतीक्षा और परीक्षा मे हैं। एनीवे ये मान कर चलो अब कि “भाया वो कामचोर टाइप के लोग कह गए हैं न.. देर आये, दुरुस्त आये, और ये बासी सी होकर आपतक देर से पहुंचने वाली ये इश्क़ का पन्ना पुरानी शराब की भांति आपकी मिजाज तंदुरुस्त कर जाने वाली  है।” यदि किसी कारणवश आप पिछली दोनों कड़ियों से अपरिचित रह गए थे, तो पढ़ने के लिए निम्नलिखित लिंक पर जोरआजमाइश कीजिए।

मैं फिर भी तुमको चाहूँगा…

मैं फिर भी तुमको चाहूँगा… -2

अबतक हम बाजार पहुंच चुके थे। सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी लंबी कतारें, जो उन तमाम दस्तावेजों को ठेंगा दिखा रहे थे जो यह दावा करते हैं कि मोदी-योगी जी का देश आज भी गरीब हैं, जिसमे विकास बऊरा गया हैं।

सड़क के दोनों और गगनचुम्बी इमारते और उनके ऊपर खड़े ४ जी और ५ जी के टावर, और इनसबके वावजूद कुछ जगह बच जाये तो उसमे लगी थी बड़े-बड़े फ्लेक्स-पोस्टर, जिनमे रणवीर सिंह, आलिया, अमिताभ, विराट कोहली-अनुष्का भौजी, धोनी जैसे क्रिकेटर-हीरो हेरोइन हस्ती अपने अपने ब्रांड के समान खरीदने का अनुरोध कर रहे थे। एक ओर बाबा रामदेव अपने पार्टनर बालकृष्ण जी के संग लोगों की टोलियां से देश का पैसा देश में रहने देने हेतु पतंजलि घी से लेकर हनी, साबुन से लेकर हैंडवाश और च्वनप्राश तक उपयोग करने की हिदायत फरमा रहे हैं।

मार्केट में उमड़ी जनसैलाब में अनेकानेक चेहरे क्रीम-पॉवडर से रंगाई-पुताई कर भीड़ में अलग पॉइंट ऑफ़ अट्रैक्शन का मुकाम हांसिल करने की अथक कोशिशें में लगे हैं। सर्वाधिक ध्यानाकर्षण का केंद्र मेरे लिए अपने पुरुष मित्र का खून पीकर ओठो को लालिमा प्रदान करने वाली मोहतरमाये  थीं।

इन विचित्र महिलाओं के लिए आंटी शब्द का प्रयोग कर कोपभाजन से बचने के लिए भाभी ज्यादा उचित प्रतीत हो रहा था। रंग-बिरंगी साड़ियों में फुटानी से लबरेज हुई इन भाभियाँ के पीछे पीछे चुन्नी चिंटू को गोदी में लेकर, उंगली पकड़ कर चलते पत्नीव्रता टाइप के भइया दिख रहे थे। बेचारे पति कम, घरेलू हिंसा से पीड़ित-शोषित दुबके से घरेलू कामगार ज्यादा लग रहे थे। काश हमारे देश की राजनैतिक पार्टिया इनके हितो की रक्षा हेतु कोई कानून बनाती, पर ये तोह इस देश के पुरुषो का दुर्भाग्य हैं भैया सारे सिंगल्स देश पे शासन कर रहे हैं| “जाके पाँव न फटी बिवाई वह क्या जाने पीर पराई” |

शादी रूपी आपदा के बाद इनकी दुर्दशा काफी हद तक मुझे झकझोर कर ‘खुद शादी करू या न करू‘, “लड्डू खाऊ या न खाऊ”, “घोड़ी चड़ू या न चड़ू” ! ये प्रश्न भविष्य पर अनिश्चितता के प्रश्न चिन्ह रूपी ब्रेकर लगा रहे हैं।पर इस चक्कर में “याद करे जहिया कुँवार रहलू, पियाबा से पहिले हमार रहलू” अलापने की नौबत आये…. न बाबा न !

मैं अभी इन सब मे उलझा-उलझा सा विभिन्न पहलुओं पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अनुसंधान कर ही रहा था कि हमारी ड्यूडैनी ने एक बड़े सामजिक ताने बाने के लिए संजीवनी की भूमिका निभाने वाले मेरे इस खोज के कंकलुजन  तक पहुंचने से काफी पहले ही गतिशील स्कूटी के ऊपर कमर में हाथ डालते हुए पूछ लिया…”गाड़ी कहा पार्क कर रहे हो..?

सारा मनन, सारे दृष्टिकोण, सारे सामाजिक विमर्श  इस स्त्री स्पर्श मात्र से शून्य पर पहुंच गया और सब व्यर्थ प्रतीत होने लगा। “कहाँ चले..?” मैंने स्कूटी को आड़ी-त्रिछि, दाये-बाये, ब्रेक -एक्सीलेटर में अपनी कलाकारी आजमाते हुए भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ते हुए पूछा।

तुमको, कोउनो आईडिया नही है का..?

हमरे पास कोउनो आईडिया-शायडिया नहीं है, हम जिओ यूज़ करते हैं..” मैंने माहौल को खुशमिजाज करने के लिए ये पुरानी सी लाइन का प्रयोग किया।

हाहाहाहा…हहहहहह व्हाट अ PJ.. LoL… कंजूस, मुफ्तखोर इंसान !

हाहाहाहा” मैंने उसका साथ देते हुए कहा “हाहाहाहा…. हँसने भी नहीं आता हैं,  हाहाहाहा….हँसने भी नही आता हैं..” मैं जोर जोर से ठहाके लगा रहा था और वो मेरा साथ दे रही थी।

एल ओ एल…. तू होगी… तू होगा…. तू… नहीं तू… तू बोला न… तू !

चुड़ैल…… भूत…… भूतनी….

भाग कुत्ता… चल कुत्ती… कुत्ता…. कुत्ती !

स्कूटी अब शहर के चौराहे से आगे बढ़ रही हैं, और हमारी ये बकबक वाली लड़ाई भी जारी हैं  !

चलिए गाड़ी पार्किंग में पार्क करके, आगे की कहानी जारी रखते हैं……


कहानी जारी हैं….. जुड़े रहिए

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© Pawan Belala 2017




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