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परिवर्तन का नाम ही जीवन है

हल बैल फिर खेत निरायी कहीं बीज कहीं पौध रोपायी हरी कौपले, कोमल डालियाँ समय से बने सुनहरी बालियाँ खलिहानों से दुकानों तक दुकानों से घर की रसोई रसोई से फिर थाली तक किस पर क्या-क्या बीता किस ने है क्या-क्या झेला कुछ जग जाहिर है इस दूरी में और कुछ न कहने की मजबूरी में कच्ची मिट्टी सांचों में ढल कर जलती भट्टी की आंच में तप कर झोंपडी महल और कंगूरे कुछ सजे हुये कुछ आधे-अधूरे खड़े हुये हैं जो सिर को



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