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आजकल कहाँ रहता हूँ मैं

पूछते हो अब कहां रहता हूँ मैं 
जहां कोई नहीं वहीं रहता हूँ मैं ।

भीड़ है, लोग हैं सब ही तो हैं यहां, 
एकाकी हूँ खामोशी से बहता हूँ मैं ।

पुष्प पसन्द है सबको, लेते है सुंगध
बंजर हूँ, वेदना कांटों की सहता हूँ मैं ।

खूब सजाए है महल तुमने कैसे कैसे,
किराए के मकां को घर कहता हूं मैं।

चलो अच्छा है अब भ्रम तो टूटा , 
रिश्तों नातों की ओट में बिकता रहा हूँ मैं । 



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