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Dehnasar Lake – Freshwater Lake in Barot Valley, Himachal Pradesh

यूँ तो अकेला भी अक्सर गिर के संभल सकता हूँ मैं,
तुम जो पकड़ लो हाथ मेरा दुनिया बदल सकता हूँ मैं।

‌यह पंक्तियाँ केवल मात्र किसी गाने की नहीं, मैंने अपने जीवन में इन पंक्तियों को बहुत करीब से महसूस किया है। जब से माउंटेन बाइट्स के साथ जुड़ा हूँ ये पंक्तियां जीवन में उतरती हुई नज़र आती हैं और स्वयं खुद को ही चरितार्थ करती हैं। माउंटेन बाइट्स एक ऐसा ग्रुप है जिसकी सोच, दूरदर्शिता, दृढ़ता, आदर्श सब उच्च कोटि के हैं। मुझे इनके साथ कई बार साहसिक यात्राओं पर जाने का मौका मिला है, हर यात्रा पर मैंने इनके साथ एक नई ताज़गी, एक नए रोमांच का अनुभव किया है। हिमालय की कोई ही पर्वत श्रृंखला होगी जहां माउंटेन बाइट्स ग्रुप के लिए जाना संभव न हो। एक ऐसी ही यात्रा का वृत्तान्त आज आपसे सांझा कर रहा हूँ। जहां जाने के लिए आपके शरीर के साथ आपके हौंसले का मजबूत होना भी जरूरी है। यह यात्रा है डेहनासर की। तो आईये आपको ले चलते हैं डेहनासर।

बात अगस्त 2016 की है,  किसी ऐसी जगह जाने की जिज्ञासा उत्पन्न हो रही थी जो हिमालय की गोद में बसी हो, जहां पहुंचना आसान ना हो और जो दुनिया की भीड़ भाड़ से भी परे हो। बहुत सी ऐसी उम्दा जगह जहन में आ रहीं थीं लेकिन जब बात डेहनासर जाने की शुरू हुई तब सभी ग्रुप मेंबर्स ने डेहनासर जाने की सहमति जताई। आईये मैं आपका परिचय करवाता हूँ हिमालय की गोद में बसी सबसे खूबसूरत पर्वत श्रृंखला धौलाधार एवं डेहनासर से और अपने साथियों से। धौलाधार में ही स्थित है डेहनासर, जो कि एक पावन तीर्थ स्थल भी है और मीठे पानी की झील भी है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग 4280 मीटर है। झील का दायरा अब लगभग 800 मीटर के आसपास रह गया है जो कि लगातार होते भूस्खलन से निरंतर कम होता जा रहा है। डेहनासर धौलाधार में स्थित एक पवित्र झील है, जैसे कि मणिमहेश। यहां भाद्रपद महीने के 20 प्रविष्टे को पवित्र स्नान होता है। बाकी वर्षभर इस स्थान पर केवल गद्दी या गुज्जर जो कि घमन्तु होते हैं अपने जानवरों को लेकर इस स्थान के आस पास रहकर गर्मियों का मौसम व्यतीत करते हैं। यह झील वर्षभर हिमखंडों से  घिरी रहती है। मैं आपका परिचय अपने साथियों से करवाता हूँ। हमारे टीम लीडर थे दिनेश लोहिया जी जिन्हें पर्वतारोहण और साहसिक यात्राओं का लंबा चौड़ा अनुभव है और माउंटेन बाइट्स के भी प्रमुख पर्वतारोही हैं। आज भी यह हर वर्ष हिमालय की गोद में बहुत सी यात्राएं करते हैं और करवाते हैं। दूसरे साथी अभिषेक थे जिन्हें अभी तक छोटी और सुगम यात्रायें ही पसंद थीं। अभिषेक का हमारे साथ चलना हमारे लिए एक नई उमंग ले कर आया।

डेहनासर झील तक पहुंचने के तीन मार्ग हैं। हमने सबसे लंबा और दुर्गम मार्ग चुना जो कि मंडी जिला के थलटूखोड से होकर जाता है, बाकी दो मार्ग कांगड़ा जिला के लोहारडी और कुल्लू जिला के बजौरा से होकर जाते हैं। खैर हमारा सफर 1 सिंतबर 2016 को दोपहर बाद हिमाचल प्रदेश के सोलन से शुरू हुआ। हमें शाम तक हमारे बेस कैम्प थलटूखोड पहुंचना था। जहां से हमारी पैदल यात्रा शुरू होनी थी। डेहनासर जाने के लिए माउंटेन बाइट्स के पास उपयुक्त संसाधन मौजूद थे। यहाँ जाने के लिए आपके पास हर वो चीज होनी चाहिए जो आपको किसी भी परिस्थिति में जीवित रखने के लिए जरूरी है। सभी तैयारियां पूरी हुईं और हम निकल पड़े अपनी मंज़िल की ओर।

सोलन से थलटूखोड का सफर लगभग 270 किलोमीटर और पहुंचने में करीब 7-8 घंटे लगते हैं। हौंसले बुलंद थे और एक नवजीवन के संचार के लिए हम तीन साथी निकल पड़े। हमारा रास्ता सड़क मार्ग से शिमला, सुंदरनगर, मंडी, पधर, घटासनी, टिक्कन होते हुए थलटूखोड तक जाना था। घटासनी मंडी पठानकोट राष्ट्रीय राजमार्ग पर सबसे ऊंचाई पर स्थित गांव है। चौहार घाटी के लिए यही प्रवेश द्वार है। यहां एक सड़क जो कि मंडी से पठानकोट जाती है और दूसरी सड़क शेष हिमाचल को चौहार घाटी से जोड़ती है। घटासनी से सीधी चढ़ाई और वलयाकार सड़क पर चार किलोमीटर चलने के बाद झटिंगरी गांव आता है। झटिंगरी किसी समय में मंडी रियासत की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी। अगर मैं अपने बचपन की यादों से थोड़ी सी धूल हटाऊँ तो मुझे याद आता है वो देवदार के ऊंचे ऊंचे वृक्षों के बीच मंडी रियासत के राजमहल जो कि उस समय भी अच्छी स्थिति में नहीं था और आज तो उसका नामोनिशान भी मिट चुका है और अतीत में ही कहीं खो गया है। बहुत दुःख होता है हमारी धरोहरों को इस तरह मिट्टी में मिलते हुए, शायद किसी ने भी इस प्राचीन धरोहर को सहेज कर रखने की हिम्मत नहीं जुटाई। झटिंगरी में सर्दियों में पर्यटक बर्फ में अटखेलियां करते हुए अक्सर नज़र आते हैं। झटिंगरी से आगे सड़क अत्यंत संकरी, गहरी खाईयों, देवदार, बान, बुरांश के जंगलों से होकर गुजरती है। कुछ ही पल के बाद ऊहल नदी के भी दर्शन ही जाते हैं। इसी ऊहल नदी से जोगिन्दरनगर स्थित शानन पावर हाउस चलता है जो आज़ादी से पहले ही बन कर तैयार हो गया था और आज भी अपनी पूरी क्षमता से कार्य करते हुए पंजाब को बिजली भेज रहा है।

अगर हम चौहार घाटी का जिक्र करें और वहां के प्रसिद्ध देव पशाकोट जी के बारे में ना लिखें तो अचरज होगा। क्योंकि देव पशाकोट को पहाड़ी वजीर के नाम से जाना जाता है और लोगों की देव पशाकोट के प्रति गहरी आस्था जुड़ी हुई है। देव पशाकोट के कई स्थानों में मंदिर हैं उनमें से एक मंदिर देवढांक में सड़क के किनारे स्थित है। जहां चौहार घाटी में प्रवेश करने वाले लोग माथा अवश्य टेकते हैं। देवढांक से 4 किलोमीटर आगे ऊहल नदी के किनारे बसा एक छोटा सा गांव टिक्कन आता है। चारों तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़ों से घिरा यह गांव शुद्ध चौहारघाटी के रंगों में नज़र आता है। टिक्कन से एक सड़क बरोट की तरह निकल जाती है और दूसरी हमारी मंज़िल थलटूखोड की तरफ। यह सड़क भी अच्छी हालत में नहीं है और रात को तो और भी भयावह दिखती है। आखिर आठ घंटे के लंबे सफर के बाद हम थलटूखोड पहुंचे जहां हमें रात बितानी थी। वाहन योग्य मार्ग केवल थलटूखोड तक ही था। आगे सड़क तो थी लेकिन घोड़े खच्चरों के लिए। इसलिए हमने अपनी गाड़ी को यहीं पर विश्राम दे दिया।

सर्दी आशा से हटकर थी। थलटूखोड ऊहल नदी की एक सहायक नदी के किनारे बसा हुआ खूबसूरत गांव है। पुरानी शैली में बने मकान और बाजार आज भी इसकी शोभा बढ़ाते हैं। अंधेरा और थकान अत्यधिक होने पर हमें टेंट इत्यादि लगाने में बहुत मुश्किल होती, इसलिए हमने एक स्थानीय अध्यापक नवीन जी के आशियाने में शरण ली। नवीन जी ने मेहमाननवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ी। आपस में बातचीत करते हुए कब नींद आ गयी इसका आभास ही नहीं हुआ। नवीन जी का विद्यालय थलटूखोड से पैदल छह किलोमीटर दूर डेहनासर के रास्ते में ही था तो सुबह उनके साथ ही हम चलने को तैयार हो गए।

सुबह सुबह सूरज की सुनहरी किरणे हरे भरे देवदार के जंगल में जब पड़ती हैं तो अनायास ही मुँह से वाह! निकल जाता है। इतने बहुमूल्य दृश्य के लिए कुदरत का धन्यवाद तो बनता ही है। जैसे ही सुबह के लगभग आठ बजे हम अपने भारी भरकम लाव लश्कर के साथ धौलाधार की चोटियों को फतह करने के लिए चल पड़े। सफर एक टूटी फूटी सड़क के साथ साथ चलता रहा। साथ में ही एक खड्ड भी बहती रही जो कि हमारी विपरीत दिशा से आ रही थी। पक्षियों का कोलाहल, गुनगुनी धूप, खड्ड का कभी डरावना तो कभी सौम्य रूप मानो हरेक चीज प्राकृतिक रूप से पहले से ही निर्धारित हो। लगभग छह किलोमीटर चलने के बाद हमारा पहला विश्राम स्थल ग्रामन नामक गाँव आया। यहीं पर नवीन जी की माध्यमिक पाठशाला थी। हमें भी विद्यालय में सुबह की सभा में जाने का मौका मिला। बच्चों की मासूमियत, उनका गुरुओं के प्रति आदर, संस्कार बस देखते ही बनता था। सुबह की सभा के बाद नवीन जी ने हमें चाय नाश्ता करवाया। अब नवीन जी का साथ बस यहीं तक था आगे का रास्ता हम तीनों को ही तय करना था। घड़ी की सुइयां ग्यारह बजे दर्शा रहीं थीं और हमें शाम होने तक चलना था।

एक सीधी चढ़ाई के बाद हम पंजोण्ड नामक गाँव में पहुंचे। पंजोण्ड इस यात्रा में आखिरी गांव है। गांव के चारों तरफ लगभग तीन फीट की चारदीवारी थी और गांव के प्रवेश द्वार पर एक सूचना पट्ट था जिस पर लिखा था कि गांव में चमड़ा, बीड़ी सिगरेट, मासिक धर्म की औरतों का प्रवेश वर्जित है। हमने गांव में प्रवेश करना उचित नहीं समझा क्योंकि हमारे पास चमड़े की बेल्ट, बटुआ और जूते थे। थोड़ी सी ऊंचाई पर जाने के बाद पंजोण्ड गांव का विहंगम दृश्य सामने आया। एक खड्ड के दोनों तरफ बसा यह गांव सचमुच इतना सुंदर था कि किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर ले।

जैसा हमने सोचा था कि ऐसी जगह जाया जाए जो भीड़ भाड़ से परे हो तो सच में ही यहां कोई भीड़ नहीं थी। सिर्फ और सिर्फ कुदरत ही फैली थी चारों तरफ। जंगल का सन्नाटा रीछू नाला तोड़ रहा था। यह केवल बोलने मात्र को ही एक नाला था इसके पानी का वेग किसी नदी से कम नहीं था। लगभग दो घंटे रीछू नाले के साथ साथ चलते चलते हमने कई खूबसूरत दृश्य अपने कैमरे में सहेज लिए। कुछ बातचीत हमने वहां पशुओं को चराने आये गुज्जरों से भी की। भोलापन जैसे कूट कूट कर भरा हो उनमें। उनसे हमने खोया खरीदा जो कि हमें बाज़ार से काफी कम कीमत पर उपलब्ध हो गया। थोड़ी देर विश्राम करने के बाद हमने फिर चलना शुरू कर दिया। अब भूख भी जोरों से लगी थी तो हमने रीछू नाले को पार करने के बाद दोपहर का भोजन करने का निर्णय लिया। अपने पेट की क्षुब्धा को शांत करने के बाद हमारा सफर शाम तक सीधी चढ़ाई में ही जारी रहने वाला था। हमारे सामने फिर एक बार देवदार का घना जंगल था और हम मानो उस जंगल में नगण्य हों। घना जंगल और चलने वाले सिर्फ तीन लोग बाकी कुदरत का साथ। हम गाने गुनगुनाते हुए आगे बढ़ते गए। रास्ते में तेज़ बारिश भी शुरू हो गयी। थोड़ी देर तक बारिश थमने का इंतजार किया और फिर से चढ़ाई शुरू कर दी। अब धीरे धीरे जंगल का रास्ता खत्म हो रहा था और हम फुंगणी जोत पहुंचने वाले थे।

फुंगणी जोत का नाम यहां की आराध्य देवी माता फुंगणी के नाम पर पड़ा है। यहां छोटी छोटी बहुत सी खूबसूरत झीलों का समूह है। ढलते हुए सूरज की सुनहरी किरणे जब इन झीलों के आसपास पड़ती हैं तो मन प्रफुल्लित हो उठता है। अब शाम होने को ज्यादा समय नहीं बचा था और हमें जल्दी से अपने टेंट इत्यादि लगाने थे। मौसम काफी ठंडा था तेज़ ठंडी हवाएं चल रहीं थीं। अंधेरा होने से पहले ही हमने टेंट लगा दिए। दिन भर की यात्रा के बाद अब बारी थी खाना बनाने की, हमारे पास तमाम चीजें थीं जैसे कि स्टोव, मिट्टी तेल, दाल चावल, मसाले इत्यादि। एक तरफ हमने जंगली जानवरों से सुरक्षित रहने के लिए आग भी जला ली। खाना बनाते समय एक ऐसा वाकया हुआ कि हमारे होश उड़ गए। स्टोव ने अचानक से काम करना बंद कर दिया। अब हमारा खाना आधा कच्चा ही था। और लकड़ी की उपलब्धता नाममात्र ही थी। क्योंकि जंगल बहुत पीछे छूट चुका था। फिर उस घुप्प अंधेरे में लगभग पांच सौ मीटर की दूरी पर एक रोशनी नज़र आई। मैं और अभिषेक उस रोशनी की तरफ बढ़ते चले गए। जब पास पहुंचे तो पत्थरों की कंदरा में कुछ यात्री विश्राम कर रहे थे। इन कंदराओं को स्थानीय भाषा में डवार कहते हैं। पुराने समय में जब लोग यात्रा पर जाते थे तो इन्ही बड़ी बड़ी कंदराओं में रात्री विश्राम किया करते थे। इन कंदराओं का सिर्फ सामने का भाग खुला रहता है बाकी सभी ओर से ये बाहरी वातावरण से यात्रियों की रक्षा करती हैं। हमारी परेशानी महसूस करने के बाद उन्होंने हमें अपने स्टोव का पंप दे दिया। हम मन ही मन उनका धन्यवाद करते हुए अपने टेंट की तरफ़ वापिस आ गए। फिर स्टोव को ठीक करने के बाद हमने खाना तैयार किया। रात्रि भोज करने के बाद हम नींद के आगोश में समा गए।

सुबह हमारी आंख किसी की आवाज़ से खुली, जिन लोगों ने हमारी मदद की थी वो अपने स्टोव के पंप को वापिस ले जाने के लिए आए थे। हमने उनका तहे दिल से शुक्रिया अदा किया और पंप उनको सौंप दिया। अब एक बार फिर हमारे सामने सुबह के नाश्ते की चुनौती थी कि नाश्ता कैसे तैयार किया जाए। आज भी हमें दिन भर की यात्रा करनी थी और खाली पेट यह सब सम्भव नहीं था। हमने कुछ एक छोटी लकड़ियां जला कर चाय बनाई। धूप भी निकल चुकी थी और हमने अपने टेंट को सुखाने के लिए धूप में रख दिया। बिस्किट के साथ वो चाय जीवन पर्यंत समर्ण में रहेगी। टेंट सूखते ही हमने दोबारा अपना सामान समेटा और चलना शुरू कर दिया।

अब दूर दूर तक प्रकृति के अलावा कुछ नहीं था। डेहनासर जाने के लिए कोई स्पष्ट रास्ता नहीं है। रास्ता बहुत ही संकरे फिसलन जोखिम भरे और गहरी खाईयों से होकर गुजरता है। एक क्षण की भी छोटी सी लापरवाही जान पर भारी पड़ सकती थी। रास्ते में पानी भी उपलब्ध नहीं है। फुंगणी जोत से ही पानी साथ में लेकर चलना पड़ता है। दोपहर बाद हम सरी पहुंचे। सरी में ही कुल्लू से आने वाले यात्री मिलते हैं। यहां भी दो छोटी सी खूबसूरत झीलें हैं। और साथ में ही गद्दी भी अपने पशुधन के साथ रहते हैं। हमारे पास पानी समाप्त हो चुका था और प्यास भी अत्यधिक लगी हुई थी तो हमने गद्दी से एक बोतल मिट्टी के तेल के बदले एक बोतल पानी मांगा जो उसने आसानी से दे दिया। जो सरी झील साथ में थी उसका पानी पीने योग्य नहीं था, भेड़ बकरियों का मल और कीचड़ बहुत मात्रा में था। गद्दी ने बताया कि वो भी पानी लगभग 3 किलोमीटर ले दूरी से लाता है। गद्दी के कठिन परिश्रम को हमने नमन किया और पानी उपलब्ध करवाने के लिए उसका धन्यवाद किया।

फिर से एक बार हमारे सामने सीधी चढ़ाई थी। कदम से कदम मिलाकर चलना शुरू किया। चढ़ाई अत्यधिक थी और ऑक्सीजन की भी कमी थी। नीचे सीधी खाई जिसे देखकर डर लग रहा था। एक बार में चार पाँच कदम से ज्यादा नहीं चला जा रहा था। हमने ज्यादा भागने की कोशिश नहीं की। शांत रहकर उस भयानक चढ़ाई को फतेह किया। खाना नहीं खाने के कारण सभी साथियों को कमजोरी महसूस हो रही थी। कभी हम ग्लूकोज पीते तो कभी गुज्जरों से खरिदा हुआ मावा खा लेते जिससे थोड़ी सी ताकत महसूस होती और फिर कदम बढ़ा लेते। चढ़ाई चढ़ने के बाद हमारे सामने विशालकाय चट्टानें और ग्लेशियर थे जिनको चढ़ते उतरते हुए अपना रास्ता तय करना था। कभी धुन्ध छा जाती तो कभी सूर्य की किरणें पहाड़ों को चमकाने लगती हर पांच मिनट के बाद मौसम एक नया रूप धारण कर लेता। शाम के लगभग चार बजने वाले थे और हमें और दो घंटों सफर अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए तय करना था। अब इक्का दुक्का लोग हमें मिलने शुरू हो चुके थे जो कि डेहनासर झील में स्नान करने के लिए जा रहे थे। दो घंटे पत्थरों और बर्फ के बीच गुजरने के बाद हम अपनी मंज़िल डेहनासर पहुंच चुके थे। सूर्य अस्त हो रहा था और अपनी पावन किरणें पहाड़ियों पर बिखेर रहा था।

हमने बिना समय गवाए अपना टेंट एक समतल जगह पर स्थापित कर लिया। पास में ही भंडारे का आयोजन भी किया गया था तो हमने भंडारे के लिये प्रस्थान किया। अचानक से एक बार फिर मौसम ने करवट ली और तेज बर्फ़बारी शुरू हो गयी। हाथ पाँव की उंगलियां सुन्न पड़ने लगी थीं। बर्फानी हवा कानो को चीरते हुए ऐसे बह रही थी मानो कानों को सिर से अलग कर के छोड़ेगी। तापमान शून्य से नीचे जा चुका था और उसी तापमान में हमने भंडारे का प्रशाद ग्रहण किया। भण्डारे के आयोजक सचमुच तारीफ़ के काबिल हैं जो इतनी विकट परिस्थितियों में भी लोगों को प्रशाद ग्रहण करवाते हैं। दिनेश लोहिया जी और अभिषेक ने टेंट में जाकर विश्राम करने का निर्णय लिया। लेकिन मुझे ठंड अत्यधिक लग रही थी तो मैंने सोचा कि थोड़ी देर आग सेंक लेता हूँ। जैसे ही मै



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